Shri Guru Teg Bahadur Ji ne Di Hindu Dharam Ke liye Kurbani
परिचय
श्री गुरु तेग बहादुर जी जिन्हें हम हिंद की चादर भी कहते हैं। हम सब ने इतिहास में पढ़ा है कि गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों के विनती करने पर हिंदू धर्म को बचाने के लिए अपने शीश का बलिदान दे दिया। लेकिन बहुत कम लोग जानते होंगे कि गुरु तेग बहादुर जी ने हिंदुओं की रक्षा के लिए अपना बलिदान ही क्यों दिया? आगे पढ़ें आपको इसके बारे जानकारी मिल जाएगी।
इतिहास
मुहिउद्दीन मुहम्मद जिसका दूसरा नाम आलमगीर और औरंगजेब था। मुहिउद्दीन मुहम्मद को इतिहास में औरंगजेब के नाम से जाना गया है जो के छठा मुगल शासक था जिसने भारत पर राज किया। इतिहास ने औरंगजेब को बहुत ही क्रूर शासक बताया है जिसने सत्ता के नशे में अपना राज कायम रखने के लिए अपने बाप को शाहजहां को गिरफ्तार करवा दिया और अपने भाइयों को कत्ल करवा दिया।
औरंगजेब का एक ही मकसद था, वह पूरे भारत में से हिंदू धर्म को खत्म करके इस्लाम धर्म फैलाना चाहता था। उसने हिंदुओं के ऊपर जुलम करने शुरू कर दिए। हिंदुओं के सभी त्योहारों पर औरंगजेब ने रोक लगा दी और अगर कोई हिंदू तीरथ यात्रा पर जाता तो उसको भारी टैक्स चुकाना पड़ता।
1699 औरंगजेब ने सभी हिंदू मंदिरों को तोड़ने का हुक्म दे दिया। उसने हिंदुओं के प्रमुख मंदिर बनारस का काशी विश्वनाथ, मथुरा का केशव मंदिर, गुजरात में सोमनाथ मंदिर, उड़िशा का जगन्नाथ पुरी मंदिरों को तुड़वा दिया। इसके इलावा बंगाल, महाराष्ट्र, चितौड़, आंध्र प्रदेश, उदयपुर, जयपुर के बहुत सारे मंदिरों को तहस नहस कर दिया।
औरंगजेब ने अपने अधिकारियों को हुक्म दिया के हर रोज हिंदुओं के गले से स्वा मन जनेऊ उतार दिए जाएं। स्वा मन तकरीबन 46 किलो बनता है। स्वा मन जनेऊ हिंदुओं के गले से उतरवाने का अर्थ था कि हर रोज इतनी बड़ी संख्या में हिंदुओं को जबरन मुस्लिम बना दिया जाए के उन सब के गले से उतारे जनेऊ का वजन कुल मिला कर स्वा मन हो और अगर कोई हिंदू मुस्लिम धर्म अपनाने से इंकार करता है तो उसे मार दिया जाए।
औरंगजेब के हुक्म का पालन काफी तेजी से होने लगा। हर दिन हजारों हिंदुओं के गले से जबरन जनेऊ उतार कर उन्हें मुस्लिम बना दिया जाता और अगर कोई मुस्लिम बनने को तैयार ना होता तो उसे मार दिया जाता।
मुस्लिम बादशाह औरंगजेब का अत्याचार शिखर पर था, बढ़ता हुआ जुल्म देख कर हिंदू धर्म के मुखिया काफी चिंतित होने लगे। इस जुल्म से निजात पाने के लिए हिंदू धर्म के कुछ मुख्य पंडितों ने मिल कर अमरनाथ की गुफा में भगवान शिव की पूजा करनी शुरू कर दी।
कई दिनों तक भगवान शिव की पूजा करने के बाद एक दिन आकाशवाणी हुई "अपने धर्म को बचाना चाहते हो तो सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास जाकर प्रार्थना करो, वो आपकी रक्षा करेंगे"।
कश्मीरी पंडितों की गुरु तेग बहादुर जी से प्रार्थना
आकाशवाणी के बाद तकरीबन पांच सौ कश्मीरी पंडितों का जत्था श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास फरियाद करने के लिए आनंदपुर साहिब पहुंचे।
उन कश्मीरी पंडितों के मुखिया का नाम किरपा राम था।
पंडित किरपा राम ने हाथ जोड़ कर गुरु तेग बहादुर जी से विनती की और कहा, "हे दीन बंधु" दिल्ली के तख्त पर बैठा बादशाह औरंगजेब बहुत ही क्रूर शासक है। वह जबरन हिंदुओं को मुस्लिम बना रहा है और अगर कोई उनकी बात नहीं मानता तो वो उसे मार देता है।
गुरु जी हमें इस जुल्म से बचाया जाए। हमारी रक्षा करें।
गुरु तेग बहादुर जी किसी भी धर्म के खिलाफ़ नहीं थे, इस्लाम के भी नहीं लेकिन किसी का जबरन धर्म परिवर्तन करवा देना भी गुरु जी को मंजूर नहीं था।
बाल गोबिंद राय ने अपने पिता गुरु तेग बहादुर जी को शहीदी के लिए प्रेरणा दी
कश्मीरी पंडितों की बात सुन कर गुरु जी कुछ समय चुप रहे और किसी गहरी सोच में पड़ गए, तभी वहां पर गुरु तेग बहादुर जी के बेटे गोबिंद राय जी पहुंचे (जो बाद में सिखों के दसवें गुरु बने)। तब गोबिंद राए की आयु 9 वर्ष थी।
बाल गोबिंद राए जी ने अपने पिता गुरु तेग बहादुर जी से पूछा, "पिता जी आप चुप क्यों हैं और ये सब कौन हैं"?
तो गुरु जी ने कहा, "बेटा, औरंगजेब हिंदुस्तान से हिंदू धर्म को मिटाना चाहता है और उसने पूरे भारत में इस्लाम धर्म फैलाने के लिए हिंदुओं को जबरन मुस्लिम बनाने के आदेश दिए हैं।"
गोबिंद राए जी ने पूछा, "पिता जी औरंगजेब ऐसा क्यों कर रहा है?"
गुरु जी ने कहा, "औरंगजेब समझता है कि पूरी दुनिया में सिर्फ इस्लाम धर्म ही सच्चा धर्म है।
गोबिंद राए जी ने पूछा, "तो फिर हिंदू धर्म को कैसे बचाया जा सकता है?
गुरु जी ने कहा, " हिंदू धर्म को बचाने के लिए किसी महान पुरष को कुर्बानी देनी होगी, तो ही हिंदू धर्म बच पाएगा।
तो गोबिंद राए जी ने कहा, "पिता जी, इस वक्त मुझे आपसे बड़ा महान पुरष नजर नहीं आता"
बाल गोबिंद राए की यह बात सुन कर गुरु तेग बहादुर जी ने इस पर विचार किया और कश्मीरी पंडितों को कहा, "जाओ इफ्तिखार खान को कह दो, पहले वो हमारे गुरु जी का धर्म परिवर्तन करवा दें, अगर हमारे गुरु जी ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया तो हम सब खुशी खुशी अपना धर्म परिवर्तन कर लेंगे।
गुरु जी की यह बात सुन कर कश्मीरी पंडितों ने चैन को सांस ली और गुरु जी से आशीर्वाद ले कर चले गए।
वापिस जा कर कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर के मुस्लिम हाकम इफ्तिखारत खान को गुरु जी का सन्देश सुना दिया। जब इस बात का पता औरंगज़ेब को लगा तो उसने सोचा के यह काम तो और भी आसान हो गया। अब सिर्फ एक आदमी को मुस्लिम बनाना होगा बाकि सब अपंने आप इस्लाम धर्म कबूल कर लेंगे और मुस्लिम बन जाएंगे और उसका हिन्दू धर्म को मिटाने का सपना साकार हो जाएगा।
गुरु जी को गिरफ्तार करने का हुक्म
औरंगजेब ने हुक्म दिया के जल्दी से गुरु तेग बहादुर जी को गिरफ्तार करके दिल्ली के कर आओ। उसने गुरु तेग बहादुर जी की गिरफ़्तारी पर इनाम भी रखा।
जब इस बात का पता गुरु जी को चला तो गुरु जी गुरगद्दी बाल गोबिंद राए को सौंप कर अपने परिवार से विधा ले कर अपने साथ भाई मती दास जी, भाई सती दस जी और भाई दयाला जी को लेकर दिल्ली की और रवाना हो गए। गुरु तेग बहादुर जी मालवा, पटियाला, जींद, लखनमाजरा और रोहतक से होते हुए आगरा पहुंचे।
गुरु तेग बहादुर जी का आगरा पहुंचने का मुख्य कारण
आगरा जाने का मुख्य कारण था गुरु जी का एक शारदालू जिसका नाम हसन अली था जो कि एक चरवाहा था। उसने गुरु जी से फरियाद की थी कि गुरु जी अगर आप गिरफ्तारी देना चाहो तो मेरे द्वारा देना ताकि मुझे इनाम मिल सके और इनाम की रकम से मेरी गरीबी दूर हो जाए।
गुरु जी ने आगरा पहुंच कर हसन अली को अपने पास बुलाया और उसे अपनी एक कीमती अंगूठी और एक शॉल दे कर कहा जाओ बाजार से मिठाई लाओ। जब हसन अली बाजार मिठाई लेने गया तो दुकानदार को शक हुआ के एक चरवाहे के पास इतनी कीमती अंगूठी और शाल कहा से आए।
वह दुकानदार उस चरवाहे को पकड़ कर थाने ले गया। थाने में हसन अली ने बताया कि बगीचे में एक साधु महात्मा ठहरे हुए हैं उन्होंने ही मुझे यह अंगूठी और शाल दिया है। थानेदार उसके साथ बगीचे में पहुंचा तो पता चला कि यह साधु महात्मा कोई और नहीं बल्कि गुरु तेग बहादुर जी हैं।
खबर सुनते ही औरंगजेब के दस हज़ार सैनिक गुरु जी को गिरफ़्तार करने के लिए आगरा पहुंच गए। इतनी बड़ी संख्या में सैनिक आगरा पहुंचने का मुख्य कारण था दिल्ली के आस पास के शहरों के 52 हिंदू राजे क्योंकि औरंगजेब को डर था गुरु जी की गिरफ़्तारी की ख़बर सुन कर 52 राजे बगावत ना कर दें। क्योंकि यह 52 राजे उन राजायों की पुश्तों में से थे जिन्हे गुरु तेग बहादुर जी के पिता गुरु हरिगोबिंद साहिब जी ने 1619 में ग्वालियर के किले से मुगल बादशाह शाहजहां की कैद से रिहा करवाया था।
औरंगजेब के वजीरों और काजियों ने गुरु तेग बहादुर जी को औरंगजेब का हुक्म सुनाया कि इस्लाम कबूल कर लें इसके बदले में आप जो चाहोगे आपको वही मिलेगा लेकिन गुरु जी ने इस्लाम कबूल करने से इंकार कर दिया।
काजियों को औरंगजेब का हुक्म था अगर गुरु तेग बहादुर जी इस्लाम कबूल करने से इंकार करें तो उनके सामने उनके सिखों को बेरहमी से कतल कर दिया जाए ताकि गुरु जी डर जाए और इस्लाम कबूल कर लें।
गुरु तेग बहादुर जी के साथियों को शहीद
मुगल सिपाहियों ने गुरु जी के एक सिख भाई मती दास जी को लकड़ियों से बांध दिया और आरे के साथ काटना शुरू कर दिया। भाई मती दास जी गुरबाणी का पाठ करते करते शहीद हो गए।
उनके बाद मुगलों ने उनके दूसरे सिख भाई दयाला जी को उबलते हुए पानी की भरी हुई देग में बिठा दिया और पानी के नीचे की आग और तेज़ करने लगे। भाई दयाला जी भी बिलकुल भी नहीं घबराए और अपने गुरुओं को वाणी का पाठ करते हुए शहीद हो गए।
बाद में गुरु जी के तीसरे सिख भाई सती दास जी को बड़ी रूई में लपेट कर आग लगा कर शहीद कर दिया। वो भी पाठ करते हुए शहीद हो गए।
गुरु तेग बहादुर जी के तीनों सिखों को गुरु जी की आंखों के सामने शहीद कर दिया लेकिन गुरु जी फिर भी नहीं घबराए।
औरंगजेब की गुरु तेग बहादुर जी को शर्तें
तीनों सिखों को शहादत के बाद भी गुरु जी इस्लाम कबूल करने के लिए नहीं माने। औरंगजेब ने गुरु जी को बहुत ही तंग पिंजरे में कैद करवा दिया जिसमें अच्छे से खड़े होना भी काफ़ी मुश्किल था।
औरंगजेब ने गुरु जी सामने तीन शर्तें रखीं:-
पहली - कोई करामात दिखाएं।
दूसरी - इस्लाम कबूल कर लें।
तीसरी - मरने के लिए तैयार हो जाएं।
गुरु तेग बहादुर जी ने औरंगजेब की पहली शर्त का जवाब देते हुए कहा, " यह श्रृष्टि केवल अकाल पुरखु के हुक्म में चलती है, कुदरत के नियमों को बदला नहीं जा सकता"
गुरु जी ने औरंगजेब की दूसरी शर्त का जवाब दिया, "मैं इस्लाम के खिलाफ नहीं हूं लेकिन किसी का जबरन धर्म परिवर्तन कर देना अधर्म है"।
तीसरी शर्त का जवाब देते हुए गुरु की ने कहा, "ना मैं जनेऊ पहनता हुं और ना मैं तिलक लगता हुं लेकिन हिंदुओं के इस अधिकार को उनसे छीना ना जाए इसलिए मैं कुर्बानी देने के लिए तैयार हुं।
गुरु तेग बहादुर जी को शहीद करने का हुक्म
औरंगजेब को पूरी तरह से यकीन हो गया कि अब गुरु जी इस्लाम कबूल करने के लिए नहीं मानेंगे। उसने सोचा कि जब तक गुरु जी जीवित रहेंगे तब तक उसका पूरे हिंदुस्तान से हिंदू धर्म मिटाने का और हिंदुस्तान में इस्लाम धर्म फैलाने का सपना पूरा नहीं होगा।
जिसके बाद औरंगजब ने हुक्म दिया कि दिल्ली के चांदनी चौंक में सभी लोगों के सामने गुरु जी का शीश धड़ से अलग कर दिया जाए। इस बात का ढिंढोरा पूरे शहर में पीट दिया गया।
गुरू तेग बहादुर जी की शहीदी
गुरु तेग बहादुर जी को दिल्ली के चांदनी चौंक में ले गए। शहादत वाले दिन गुरु जी ने सुबह उठ कर इस्नान किया, पाठ किया और एक पेड़ के नीचे बैठ गए। लोगों की भीड़ इक्ट्ठा हो गई। आसमान में काले बादल छा गए। धीरे धीरे हवा तेज होने लगी।
कुछ देर बाद जलाद आया, जलाद ने अपनी तलवार निकाली और गुरु जी के शीश पर वार करते हुए गुरु जी का शीश धड़ से अलग कर दिया।
गुरु जी के शहीद होते ही पूरे शहर में हाहाकार मच गई। लोग ज़ोर ज़ोर से चिलाने लगे "यह जुलम है, अत्याचार है, बहुत बड़ा जुलम है"
इतने बड़े संत को कतल कर दिया "यह अन्याय है, जुलम है"
अब यह हकूमत ज्यादा देर चलने वाली नहीं।
गुरु जी के शीश का अंतिम संस्कार
गुरु जी के शहीद होते ही बहुत बड़ा तूफान आया। तूफान इतना जोर का था कि चारों और सिर्फ धूल ही धूल थी और कुछ भी दिखाई नही आ रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे इस जुल्म को देख कर पूरा ब्रह्मांड ही क्रोध में आ गया हो।
इस तूफान का फ़ायदा उठाते हुए गुरु जी के एक सिख जिनका नाम जैता था। उसने गुरु जी का शीश उठाया और एक कपड़े में लपेट कर अपने साथी भाई नानू और भाई उद्दे जी को साथ लेकर पंजाब की और रवाना हो गए और तकरीबन पांच दिन बाद यह तीनों गोबिंद राए (गुरु गोबिंद सिंह जी) के पास कीरतपुर साहिब पहुंचे।
भाई जैता जी ने गुरु तेग बहादुर जी का शीश गोबिंद राए जी को सौंप दिया। गोबिंद राए जी ने भाई जैता जी को गले से लगाया और कहा "रंगरेटा गुरु का बेटा"
जिसके बाद गुरु जी के शीश का अंतिम संस्कार आनंदपुर साहिब में बड़े ही सतिकर से किया गया।
गुरु जी के धड़ का अंतिम संस्कार
गुरु जी के धड़ का अंतिम संस्कार करने के लिए गुरु तेग बहादुर जी के एक श्रद्धालु जिनका नाम लखी शाह बंजारा था, वह अपने बेटे के साथ रूई से भरी हुई बैलगाड़ियां ले कर चांदनी चौंक पहुंचे और गुरु जी के धड़ को बड़े ही आदर सहित बैलगाड़ी में रखा और रूई के ढेर में छिपा दिया और अपने घर ले गए।
जब तूफान थमा तो मुगल सिपाहियों को गुरु जी का शीश और धड़ नहीं मिला तो वह हैरान रह गए और गुरु जी का शीश और धड़ ढूढने लगे।
भाई लखी शाह बंजारा ने गुरु जी के धड़ का अंतिम संस्कार करने के लिए अपने घर को ही आग लगा दी। मुगल फ़ौज और लोगों ने सोचा के लखी शाह के घर को आग लगने का कोई और ही कारण है।
हिंदू धर्म को बचाने के लिए गुरु तेग बहादुर जी ने कुर्बानी दे दी, गुरु जी की इस शहादत को याद करने के लिए ही कहा जाता है।
"हिंद की चादर तेग बहादुर"
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