जब रवींद्रनाथ टैगोर ने बलराज साहनी को बताया पंजाबी भाषा का महत्व
बात उन दिनों की है जब बलराज साहनी पश्चिम बंगाल के शतिनिकेतन में सर रवींद्रनाथ
टैगोर के विश्व भारतीय विद्यालय में बतौर अधियापक पढ़ाते थे।
एक दिन बलराज साहनी विद्यालय में होने वाले सालाना समारोह में सर रवींद्रनाथ
टैगोर को निमंत्रण देने के लिए गए। निमंत्रण पत्र देने के बाद दोनों में बातचीत
शुरू हो गई।
सर रवींद्रनाथ टैगोर ने बलराज साहनी को पूछा तुम यहां पढ़ाने के ਸਾਥ और क्या करते
हो? तो बलराज साहनी ने जवाब दिया कि मैं यहां पढ़ाने के साथ कहानियां भी लिखता
हूं। मैं एक लेखक भी हूं। मैने हिंदी और अंग्रेजी में बहुत सारी कहानियां लिखी
हैं जो बहुत पत्रिकाओं में भी छप चुकी हैं।
सर रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा तुम अपनी कहानियां हिन्दी और अंग्रेजी में ही क्यों
लिखते हो जब कि तुम्हारी मात्र भाषा तो पंजाबी है। तुम्हें तो पंजाबी में
कहानियां लिखनी चाहिए।
यह बात सुन कर बलराज साहनी ने सोचा कि रवींद्रनाथ टैगोर की सोच कितनी छोटी है,
टैगोर एक प्रांतीय व्यक्ति हैं इसीलिए ऐसा बोल रहे हैं, बलराज साहनी कहते हैं कि
मुझे नहीं पता था कि एक व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध होने के लिए
पहले उसके शब्दों के अर्थों को राष्ट्रीय स्तर पर जाना चाहिए। व्यक्ति से पहले
उसके शब्द प्रसिद्ध हो। उसके शब्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलना
चाहिए।
बलराज साहनी ने कहा, हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है। यह भाषा संपूर्ण रूप से
हमारे राष्ट्र की है। अगर मैं सारे देश के लिए लिख सकता हूं तो फिर मैं किसी
राज्य भाषा में क्यों लिखूं ?
वैसे तो मैं बंगाली में भी लिखता हूं लेकिन फिर भी मुझे सिर्फ़ हिंदुस्तान के
नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लोग पढ़ना चाहते हैं। में आपकी तरह बहुत महान लेखक
नहीं हूं मैं तो एक आम सा लेखक हूं।
रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा, इसमें बड़े या छोटे लेखक की बात नहीं है। बात यह नहीं
है की कौन महान लेखक है और कोन आम। बात यह है कि हर लेखक का अपनी जन्मभूमि, मात्र
भाषा और अपने लोगों के साथ कोई संबंध होता है।
तब बलराज साहनी ने कहा, आपको मेरे राज्य के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। पंजाब
में हम हिंदी या उर्दू मेरे लिखते हैं, वहां पंजाबी में कोई नहीं लिखता क्योंकि
पंजाबी बहुत ही पिछड़ी हुई भाषा है। पंजाबी को भाषा नहीं कहा जा सकता। पंजाबी
भाषा हिंदी की उपभाषा है।
रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा, में आपकी इस बात से सहमत नहीं हूं क्योंकि पंजाबी साहित
और बंगाली सहित बहुत पुराना है। पंजाबी भाषा में बहुत महान कवि हुए हैं। आप उस
भाषा को बुरा कैसे बोल सकते हैं जिसमे एक बड़े ही महान कवि गुरु नानक देव जी ने
अपनी रचनाएं लिखी हो।
जिन्होंने लिखा हो
गगन मैं थालु रवि चंदु दीपक बने
तारिका मंडल जनक मोती।।
धूप मलिआनलो पवनु चवरो करे
सगल बनराए फुलंत जोती।।
कैसी आरती होए।। भवखंडना तेरी आरती।।
अनहता सबद वाजंत भेरी।।
अर्थात यह जो आकाश है वो एक थाली है, चंद्रमा और सूर्य उसके दिये हैं। यह जो आकाश
में हजारों तारें हैं यह सब उस थाल में रखे हुए दीपकों जैसे हैं।
मलय पर्वत से आने वाली हवा अगरबती से निकल रहे धुएं जैसे है। हवा चवर कर रही है।
यह जो बानसपति है यह उस प्रभु की आरती करने के लिए फूल दे रही है।
हे प्रभु तुम्हारी आरती बेहद खूबसूरत है, तुम्हारी आरती अदभुत है।
बलराज साहनी ने कहते हैं कि मैंने सोचा जब हिंदुस्तान आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था तब
हिंदुस्तान को एक राष्ट्रिय भाषा की जरूररत थी। कांग्रेस इसे एक राष्ट्रिय भाषा
बनाने के लिए यातन कर रही थी। मैं उनसे बहस कर लेता लेकिन मैंने उनसे बहस करना
ज़रूरी नहीं समझा क्यूंकि जो गुरु नानक देव जी की ज्ञान भरी बात उन्होंने मुझे कही
मैं वह सुन कर मेरे मन में उनके क लिए सम्मान काफी बढ़ गया।
इसके बाद बलराज साहनी वहां से जाने लगे। अभी बलराज साहनी दरवाजे तक ही पहुंचे थे
कि गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा, एक वेसवा बहुत सारा धन तो इक्ट्ठा कर
सकती है लेकिन सारी जिंदगी इज्जत और सम्मान नहीं पा सकती।
इसी तरह अगर हम अपना पूरा जीवन किसी और भाषा में लिखने में बिता देंगे तो आपके
अपनी भाषा वाले लोग आपको स्वीकार नहीं करेंगे और न ही वो लोग आपको स्वीकार करेंगे
जिनकी भाषा में आप लिखी रहे हो।
दूसरी भाषा के लोगों पर जीत हासिल करने से पहले अपने लोगों पर जीत हासिल करो।
इस बात ने बलराज साहनी के दिल पर गहरी शाप छोड़ी जिसके बाद बलराज साहनी पंजाबी
भाषा में अपनी कहानियां लिखने लगे।

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